Jayendra Lok

Guruvar Kee Ungalee Pakadakar (Hindi)

गुरुवर की उंगली पकडकर चलना है, 

आए भले ही कंटक-कंकर,

ना कभी ढलना है, 

अब बनेंगे मेरे बडे गुरुजी मैया, 

वैरागी रंग लगत है मोरी सैया, 

गुरुमैया ओ गुरुमैया…(१)

 

पंछी की तरह, मुक्त गगन में उडना है, 

पवन की तरह, सारे जहां में विहरना है, 

यहां नहीं है कोई बंधन,

प्रभु मेरी रक्षाबंधन,

 यहां हर दिन दिवाली, खुशहाली है मैया,

 गुरुमैया ओ गुरुमैया…(२)

 

गुरु सेवा से, हरी-भरी, बीतेगी रतिया, 

गुरु चरणन को, स्पर्शन से,

खुलेगी अंखिया, 

अब ना कोई तमन्ना, होगा आतम धन्ना, 

 राग समंदर के उसपार, पहुंचेगी ये नैया, 

 गुरुमैया ओ गुरुमैया…(३)

 

अजनबी आनंद में,

अब तन-मन भाया है,

 कलयुग में भी,

आज हमें परमातम पाया है, 

पल-पल मैं तो खोई,

चंचल आंखे है रोई, 

“उदय” हुआ तकदीर का,

मेरे प्रभु खेवैया, 

गुरुमैया ओ गुरुमैया…(४)