Jayendra Lok

Aavo Re O Nath (Hindi)

आवो रे, ओ नाथ मनमंदिरे…

 

श्रद्धानी साखमां, प्रीतिनी पांखमां; 

शमणुं सजाव्युं अमे, आतम आंखमां..

 अंतरना ओरडे, रेलायो रंग रे;

 आयो रे आंगणे, पावन प्रसंग रे.. 

मूरति मनभावन लागे, केवी सोहामणी, 

रोमेरोमे प्रगटी छे, भक्ति रागिणी..

 खम्मा.. मुनिसुव्रत जिनराजा, दरबारे वागे वाजा,

 मनमंदिर आवो मोठा महाराजा..

 खम्मा.. मुनिसुव्रत जिनराजा, छो त्रण भुवनना राजा, 

मनमंदिर आवो मोटा महाराजा..(१)

 

हो.. दिव्य प्रासादमां, घंटारव नादमां;

 दसे दिशाओ गुंजे, हर्ष निनादमां..

 चंपा ने मोगरो, म्हेके मंदिरीये; 

आवो मन-मीत थईने, दिलना देवळिये.. 

नयनोनुं नूर तमारूं, कामण एवुं करे; 

दर्शन तमाएं स्वामी, भवना दुःखो हरे.. 

खम्मा.. मुनिसुव्रत जिनराजा, जिनशासनना दिवाजा, 

मनमंदिर आवो मोठा महाराजा… 

 खम्मा.. मुनिसुव्रत जिनराजा, छे भक्तो तारा झाझा, 

मनमंदिर आवो मोटा महाराजा..(२)

 

हो.. वसिया जेनी छायामां, मयणां-श्रीपाल रे;

अरिहा-सिद्धा ने साहू शरणम् स्वीकार रे..

राजगृहीना राजा, आवो अम द्वार रे;

सर्व परिता करती, स्वागत सत्कार रे..

मुनि बनीए ने, सुव्रत धरीए साहेबजी;

मंगळ शिव – राज-रश्मि वरीए साहेबजी..

खम्मा.. मुनिसुव्रत जिनराजा, छो आतम सुखना भाजा,

मनमंदिर आवो मोठा महाराजा..

खम्मा.. मुनिसुव्रत जिनराजा, ‘जय’कारा जगमें गाजा,

मनमंदिर आवो मोटा महाराजा..(३)