Jayendra Lok

बाबा बैजनाथ को क्यों चढ़ाते हैं उत्तरवाहिनी गंगा का जल, जानें कैसे हुई उत्तरवाहिनी गंगा की उत्पत्ति

सावन माह की शुरुआत हो गई है और इस माह में उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर भगवान शिव पर जल अर्पण करने का एक अलग ही महत्व है। भागलपुर जिले स्थित सुल्तानगंज उत्तरवाहिनी गंगा से कांवरिया गंगाजल भर कर देवघर स्थित बाबा बैजनाथ धाम को कांवर यात्रा करते हैं। हिंदू धर्म में कांवड़ यात्रा बहुत पवित्र मानी जाती है। वही सावन माह में कांवड़ यात्रा में श्रद्धालु लोग पवित्र गंगा नदियों से जल भरकर पैदल यात्रा करते हुए शिव मंदिरों तक पहुंचते हैं और उस जल से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। इस यात्रा का उद्देश्य भगवान शिव की भक्ति व आराधना करना और उनकी कृपा प्राप्त करना होता है।

सावन मास में शिवजी ने किया विषपान
मान्यताएं हैं कि सावन माह में ही समुद्र मंथन के समय निकले विष को शिवजी ने विषपान किया था। वही अग्नि के समान विष पीने के बाद शिव का कंठ एकदम नीला पड़ गया था। विष की उष्णता को शांत कर भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए समस्त देवी-देवताओं ने उन पर जल अर्पण किया, जिसके बाद भगवान शिव की विष की उष्णता शांत हुई थी।

आखिर क्यों खास है उत्तरवाहिनी गंगा

वहीं जिले स्थित सुल्तानगंज उत्तर वाहिनी गंगा घाट पर कांवरियों की भीड़ देखने लगी है। अजगैबीनाथ मंदिर के महंत प्रेमानंदगिरी की मानें तो पूरे भारत में सिर्फ दो ही जगह उत्तरवाहिनी गंगा बहती है। एक काशी विश्वनाथ तो दूसरा भागलपुर का सुल्तानगंज में। लेकिन सबके मन में एक प्रश्न आता है कि आखिर उत्तरवाहिनी गंगा खास क्यों? मान्यता है कि उत्तर दिशा में भगवान शिव का वास होता है, इसलिए इसका महत्व खास है।

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इस तरह हुई उत्तरवाहिनी गंगा की उत्पत्ति
उत्तरवाहिनी गंगा का इतिहास जांघो मुनि से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि सदियों पहले जांघो मुनि नाम के ऋषि तप कर रहे थे। राजा भागीरथ द्वारा धरती पर लाई गई गंगा की तेजधार में ऋषि का कमंडल बह गया। जब जांघो मुनि तपस्या से उठे और देखा की कमंडल नहीं है तो वह क्रोधित हो गए। क्रोध में आकार ऋषि ने पूरी गंगा को पी लिया। यह देख सभी देवी देवताओं में हाहाकार मच गया। गंगा के सूख जाने से धरती पर किल्लत होने लगी। तभी देवी देवताओं सहित ऋषि मुनियों के द्वारा जांघो मुनि को गंगा वापस लाने के लिए उसे मनाने लगें। तभी मुनि का क्रोध शांत हो गया और गंगा वापस लाने को तैयार हो गए। लेकिन उनके मन में एक दुविधा थी अगर मैं गंगा को मुंह से बाहर लाऊंगा तो वह झूठी हो जाएगी। इसके बाद उन्होंने अपनी जंघा से गंगा को बाहर निकाला और उसे उत्तर दिशा में प्रवाहित कर दिया।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले कांवड़ यात्रा की शुरुआत भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान श्रीराम सुल्तानगंज उत्तरवाहिनी गंगा से अपने कांवड़ में गंगाजल भरकर बाबा बैजनाथ धाम के शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। यहीं से कांवड़ यात्रा की शुरुआत मानी जाती है।