Jayendra Lok

Jwala Devi Temple : ज्वालादेवी की ज्वाला कब होगी शांत, जानें ज्वाला देवी की ज्वाला का क्या है रहस्य

ज्वाला देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। ज्वाला देवी का मंदिर दक्षिण हिमाचल में स्थित है। ज्वाला देवी के इस मंदिर को ज्वालामुखी के नाम से भी जाना जाता है। यहां की अग्नि आज तक शांत नहीं हुई है। ऐसा कहा जाता है कलयुग में ही ज्वाला देवी की अग्नि शांत होगी। आइए जानते हैं ज्वाला देवी से जुड़े रहस्य।

जब भगवान विष्णु ने सती के शरीर के टुकड़े किए थे तो उनकी जीभ इसी स्थान पर आकर गिरी थी। इसलिए इसका नाम ज्वाला देवी मंदिर पड़ गया। इस मंदिर की अनोखी बात यह है कि यहां जो अग्नी जल रही है वह वर्षों से बिना तेल और बाती के प्राकृतिक रूप से जल रही है।

कब शांत होगी ज्वाला देवी की ज्वाला

मान्यता के अनुसार, भक्त गोरखनाथ ज्वाला देवी मंदिर में मां ज्वाला की आराधना करते थे। वह माता के सच्चे भक्त थे। वह पूरी श्रद्धा और सच्चे मन से उनकी भक्ति किया करता था। एक बार गोरखनाथ की पूजा से प्रसन्न होकर मां ज्वाला ने उन्हें दर्शन दिए। गोरखनाथ ने माता ज्वाला से कहा कि उन्हें भूख लगी है। गोरखनाथ ने कहा कि माता आप अग्नि जलाकर रखिए मैं भिक्षा मांग कर आता हूं। माता ने ज्वाला जला दी लेकिन, बहुत समय बीतने के बाद भी गोरखनाथ वापस नहीं लौंटे। तभी से माता यहां अग्नि जलाकर गोरखनाथ की प्रतीक्षा कर रही हैं। कहा जाता है कि कलयुग के अंत तक मां ज्वाला अपने भक्त गोरखनाथ की प्रतीक्षा करेंगी।

मंदिर के पास है चमत्कारी कुंड

ज्वाला देवी के मंदिर के पास ही गोरखनाथ का मंदिर भी स्थित है। यहां एक चमत्कारी कुंड भी है। जिसे गोरख डिब्बी के नाम से जाना जाता है। यह कुंड जब आप दूर से देखेंगे तो आपको ऐसा लगेगा की इस कुंड का पानी बहुत ही ज्यादा गरम है लेकिन, जैसे ही आप उसके पास पहुचेंगे और पानी को स्पर्श करेंगे तो आपको कुंड का पानी बहुत ठंडा लगेगा।

मां ज्वाला के सामने नतमस्तक हुआ था अकबर

कहानियों और मान्यताओं के अनुसार, मां ज्वाला जी की ज्वाला को बुझाने का प्रयास मुगल सम्राट अकबर ने भी किया था। मंदिर में जलती हुई ज्वाला के बारे में जब अकबर को पता चला तो वह देखने के लिए ज्वाला मंदिर पहुंचा। अकबर के मन में कई आशंकाएं थी। उसने लौं को बुझाने के लिए कई प्रयास किए। उसने ज्वाला के ऊपर पानी डालने तक का आदेश दे दिया था। लेकिन, ज्वाला देवी की ज्वाला जलती ही रही। इस चमत्कार को देखकर अकबर बहुत खुश और आश्चर्यचकित हुआ। देवी के इस चमत्कार को देखकर अखबर ने ज्वाला देवी को सोना का छत्र भेंट किया था। हालांकि, मां ज्वाला ने अकबर की यह भेट नहीं स्वीकार की। सोना का छत्र गया गया फिर इसे बाद में अन्य धातु में बदला गया।