Jayendra Lok

Category: पूजायें एवं पाठ

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सोलह कारण पूजा || Solah Karan Pooja

कविवर द्यानतराय (अडिल्ल) सोलह कारण भाय तीर्थंकर जे भये | हरषे इन्द्र अपार मेरुपै ले गये || पूजा करि निज धन्य लख्यो बहु चावसौं| हमहू षोडश कारन भावैं भावसौं || ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादि षोडशकारणानि! अत्र अवतर अवतर संवौषट् | ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादि षोडशकारणानि! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः | ॐ

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पंच मेरु पूजा || Panch Meru Pooja

कविवर ज्ञानतराय गीता छंद तीर्थंकरों के न्हवन जलतें भये तीरथ शर्मदा, तातें प्रदच्छन देत सुर गन पंच मेरुन की सदा | दो जलधि ढाई द्वीप में सब गनत-मूल विराजहीं, पूजौं असी जिनधाम प्रतिमा होहि सुख दुख भाजहीं || ॐ ह्रीं पंचमेरूसम्बन्धि अस्सी जिनचैत्यालयस्थजिनप्रतिमा-समूह! अत्र अवतर अवतरसंवौषट् | ॐ ह्रीं पंचमेरूसम्बन्धि

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दस लक्षण पूजा – Jain Das Lakshan Pooja

कविवर ज्ञानतराय आडिल्ल उत्तम छिमा मारदव आरजव भाव है, सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं | आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दस सार हैं, चहुँगति दुखते काढि मुक्ति करतार हैं || ॐ ह्रीं उत्तम-क्षमा-मार्दव-आर्जव-शौच-सत्य-संयम-तप-त्याग-आकिंचन-ब्रह्मचर्य-आदि-दसलक्षण-धर्माय ! अत्र अवतर अवतर संवौषट ! ॐ ह्रीं उत्तम-क्षमा-मार्दव-आर्जव-शौच-सत्य-संयम-तप-त्याग-आकिंचन-ब्रह्मचर्य-आदि-दसलक्षण-धर्माय ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: ! ॐ

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रत्नत्रय पूजा – RATNATRAYA POOJA

कविश्री द्यानतराय (दोहा) चहुँगति-फनि-विष-हरन-मणि, दु:ख-पावक जल-धार | शिव-सुख-सुधा-सरोवरी, सम्यक्-त्रयी निहार || ॐ ह्रीं श्री सम्यक् रत्नत्रय धर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री सम्यक् रत्नत्रय धर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री सम्यक् रत्नत्रय धर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्) अष्टक (सोरठा छन्द)

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सम्यग्दर्शन पूजा – SAMYAK DARSHAN POOJA

(दोहा) सिद्ध अष्ट -गुणमय प्रगट, मुक्त-जीव-सोपान । ज्ञान चरित जिंह बिन अफल, सम्यक्दर्श प्रधान ।। ॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन !अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्)

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सम्यग्ज्ञान पूजा – SAMYAK GYAN POOJA

(दोहा) पंच भेद जाके प्रकट, ज्ञेय-प्रकाशन-भान | मोह-तपन-हर चंद्रमा, सोई सम्यक्ज्ञान || ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान! अत्र तिष्ट तिष्ट ठ: ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्) (सोरठा छन्द) नीर सुगंध अपार, तृषा

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सम्यकचारित्र पूजा – Samyak Charitra Pooja

दोहा – विषय-रोग औषध महा, दव-कषाय जल-धार | तीर्थंकर जाको धरे सम्यक् चारित्र सार || ॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् | ॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः | ॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् | सोरठा   नीर सुगन्ध

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KSHAMAVANI POOJA – क्षमावणी पर्व-पूजा

कविश्री मल्ल (छप्पय छन्द) अंग-क्षमा जिन-धर्म तनों दृढ़-मूल बखानो |सम्यक्-रतन संभाल हृदय में निश्चय जानो ||तज मिथ्या-विषमूल और चित निर्मल ठानो |जिनधर्मी सों प्रीति करो सब-पातक भानो ||रत्नत्रय गह भविक-जन, जिन-आज्ञा सम चालिए |निश्चय कर आराधना, कर्मराशि को जालिये ||ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्ररूप-रत्नत्रय! अत्र अवतर अवतर संवौषट्!(आह्वाननम्)ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्ररूप-रत्नत्रय!

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जैन सरस्वती पूजा – Saraswati Pooja

(दोहा) जनम-जरा-मृतु क्षय करे, हरे कुनय जड़-रीति | भवसागर सों ले तिरे, पूजे जिनवच-प्रीति || ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेवि ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेवि ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेवि ! अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट् । (त्रिभंगी) क्षीरोदधि गंगा, विमल तरंगा,

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सलूना पूजा – Saloona Pooja

श्रीअकम्पनाचार्यादि सप्तशत मुनि पूजा चाल जोगीरासा पूज्य अकम्पन साधु-शिरोमणि सात- शतक मुनि ज्ञानी । आ हस्तिनापुर के कानन में हुये अचल दृढ़ ध्यानी ॥ दुखद सहा उपसर्ग भयानक सुन मानव घबराये। आत्म-साधना के साधक वे, तनिक नहीं अकुलाये॥ योगिराज श्री विष्णु त्याग तप, वत्सलता-वश आये। किया दूर उपसर्ग, जगत-जन मुग्ध

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