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Category: पूजायें एवं पाठ

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श्री विष्णुकुमार महामुनि पूजा – Mahamuni Pooja

लावनी छन्द श्री योगी विष्णुकुमार बाल वैरागी, पाई वह पावन ऋद्धि विक्रिया जागी सुन मुनियों पर उपसर्ग स्वयं अकुलाये, हस्तिनापुर वे वात्सल्य-भरे हिय आये || कर दिया दूर सब कष्ट साधना-बल से, पा गये शान्ति सब साधु अग्नि के झुलसे । जन जन ने जय-जयकार किया मन भाया, मुनियों को

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दीपावली-पूजन -विधि (Depawali Pujan Vidhi)

जैन धर्म के अनुसार दीपावली विधि अनादि अनंत काल से भरतक्षेत्र में अनंत चौबीसी के तीर्थंकर अनंत- अनंत काल से होते आए हैं, इसी क्रम में इस युग में भी ऋषभनाथ से लेकर महावीर पर्यन्त चौबीस तीर्थंकर हुए। तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के २५६ वर्ष साढ़े तीन माह के बाद अन्तिम

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चौसठ ऋद्धि अर्घ्य (चौसठ अर्घ्य चढ़ावें) – Chausath Riddhi Arghya

ॐ ह्रीं अवधिज्ञानबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं मनः पर्ययज्ञानबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं केवलज्ञानबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं बीजबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं कोष्ठज्ञानबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं पदानुसारिणीबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ

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सम्मेदशिखर पूजा – Sammed Shikhar Pooja

पं. जवाहरदास दोहा ‘श्रीजिन बीस जिनेश के, बीसों शिखर महान । और असंख्य मुनीश जहँ, पहुँचे शिवपद थान ॥ ॐ ह्रीं सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र मम सन्निहितं भव भव वषट् । अष्टक

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प्रत्येक टोंक के अर्घ्य – पच्चीस टोंक के अर्घ्य

टोंक प्रति जलादि द्रव्य चढ़ाने की विधि (१) २४ तीर्थंकरों के गणधरों की कूट चौबीसों जिनराज के, गण नायक हैं जेह । मन वच तन कर पूजहूं, शिखर सम्मेद यजेह || ॐ ह्रीं श्री गौतम स्वामी आदि गणधर देव गुणावा ग्राम के उद्यान आदि भिन्न-भिन्न स्थानोंसे निर्वाण पधारे हैं तिनके

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श्री गिरनार पूजा || Shri Girnar Pooja

दोहा बंदौं नेमि जिनेश पद, नेमि-धर्म-दातार । नेम धुरंधर परम गुरु, भविजन सुख कर्तार ||१|| जिनवाणीको प्रणम कर, गुरु गणधर उर धार । सिद्धक्षेत्र पूजा रचौं, सब जीवन हितकार ॥२॥ उर्जयंतगिरि नाम तस, कह्यो जगत विख्यात । गिरिनारी तासें कहत, देखत मन हर्षात ||३|| द्रुतविलंबित तथा सुन्दरी छन्द गिरि सु

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श्री कैलासगिरि पूजा || Shri Kailas Giri Pooja

रोला छन्द श्री कैलाश पहाड़ जगत परधान कहा। आदिनाथ भगवान जहां शिववास लहा है। नागकुमार महाबाल व्याल आदि मुनिराई। गये तिहिं गिरिसों मोक्ष थाप पूजों शिर नाई|| दोहा – श्री कैलाश पहाड़ सों आदिनाथ जिनदेव। मुनी आदि जे शिव गये, थापि करों पद सेव॥ ॐ ह्रीं कैलाशपर्वततः मुक्तिपदप्राप्तश्री आदिनाथस्वामिन् वा

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जैन श्रुतपञ्चमी पूजा || Shrutpanchami Pooja

सरस्वती की पूजा करने, श्री जिनमन्दिर जायेंगे। भव्य भारती की पूजा में, जीवन सफल बनायेंगे| श्रुत के आराधन से मन में, ज्ञान की ज्योति जलायेंगे। पर्यायों को कर विनष्ट हम, निजस्वरूप को पायेंगे॥ अतः करें आह्वान मात का, दृढ़ता हमको दे देना। सदा रहे बस ध्यान आपका, ये ही सबक

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जैन सुगन्ध दशमी व्रत पूजा || Sugandha Dashami Vrat Pooja

दोहा वृषभदेव को आदि दे, शीतल जिन पर्यन्त । मंगलकर जिनवर नमूँ, होवे भव का अन्त ||१|| जिन शासन में व्रत कहे, एक शतक वसु जान । उनके उत्तम फल कहे, गति विधि को पहचान ॥२॥ व्रत सुगंध दशमी महा उनमें एक सुजान । जिनकी महिमा अमित है, श्रुतगोचर सुख

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जैन चारित्र-शुद्धि व्रत पूजा || Charitra Shuddhi Vrat Pooja

दोहा शुद्ध  सुगुण  छ्यालीस युत, समोशरण  के  ईश । निज आतम उद्धार हित, नमत चरण में शीश ॥१॥ आत्म-शुद्धि के अर्थ हम, जिनवर पूज रचाय । रत्नत्रय की प्राप्ति हित, श्री जिनेन्द्र गुण गाय ॥२॥ करूँ त्रिविधि शुधियोग से, आह्वानन विधि सार । आवहु तिष्ठहु हृदय में, नाथ त्रिलोक अधार

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